ILFS संकट से 1400 शीर्ष कंपनियां प्रभावित, 9,700 करोड़ रुपया फंसा

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नई दिल्ली। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज ( ILFS ) अब पूरी तरह महामारी से ग्रस्त है। देश की 1,400 बड़ी कंपनियों की कुल 9,700 करोड़ रुपये की रकम आईएलएंडएफ के विषाक्त बांड में फंसी हुई। इसमें लाखों कर्मचारियों की भविष्य निधि और पेंशन निधि का पैसा फंसा हुआ है। इसका खुलासा राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ( nclat ) के समक्ष आठ अप्रैल को अपीलकर्ताओं की ओर से दाखिल पूरक हलफनामे से हुआ है। इस खुलासे में आईएलएंडएफएस से जुड़ी विभिन्न कंपनियां शामिल हैं, जिनमें 970 कंपनियों के समूह आईएफसीआई फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड, आईएलएंडएफएस ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क्‍स ( ITNL ) और एचआरईएल शामिल हैं।
सूची में शक्तिशाली सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (पीएसयू) जैसी प्रमाणिक भारतीय कंपनियां, अनेक कॉरपोरेट और आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड व अन्य जैसी इकाइयां शामिल हैं। यह कहना उपयुक्त होगा कि कर्मचारी वर्ग की बचत की राशि इसमें फंसी हुई है। मामला हालांकि एनसीएलएटी के पास है, लेकिन आईएलएंडएफएस या सरकार इस पैसे को वापस करने की स्थिति में नहीं है। इसमें संलिप्त कंपनियां दिवालिया हो चुकी हैं। मालूम हो कि कंपनी में गड़बड़ी उजागर होने से पहले सितंबर 2018 तक बांड की रेटिंग ‘एएए’ थी। यह देखना रोचक होगा कि रायसीना हिल में बनने वाली नई व्यवस्था से इसपर सवाल पूछे जाएंगे, भले ही भारतीय जनता पार्टी मजबूत गठबंधन के साथ नए अवतार में हो।
पैदा होने वाले संकट के स्वरूप को पूरी तरह समझते हुए एनसीएलएटी ने उसी दिन कर्ज में डूबी आईएलएंडएफएस की अंबर कंपनियों के ऐसे निवेश फंडों में पेंशन और भविष्यनिधि के निवेशों की सुरक्षा करने का कदम उठाने का आदेश दिया। न्यायाधिकरण आगे 16 अप्रैल की बैठक में कर्मचारी भविष्य निधि और पेंशन निधि के बकाये कुछ भुगतान को जारी करने में दिलचस्पी ले सकता है। दो सदस्यीय पीठ ने कहा, “कितनी कंपनियों की भविष्य निधियां और पेंशन निधियां हैं? आप उनको भुगतान निर्गत करें। हम चाहते है कि उनका भुगतान पहले जारी हो।”
आईएलएंडएफएस के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अगर अंबर कंपनियों के व्यक्तिगत कर्जदाताओं को भुगतान किया जाएगा तो इससे अन्य समूह वाली इकाइयों के समाधान पर घातक प्रभाव पड़ेगा। कर्मचारी वर्ग के लाखों लोगों के इस विषाणु से प्रभावित होने के हालात को देखते हुए 16 अप्रैल को इस गतिरोध का कुछ समाधान देखने को मिल सकता है। कंपनी कार्य मंत्रालय के क्षेत्रीय निदेशक कार्यालय (पश्चिम) में संयुक्त निदेशक राकेश तिवारी द्वारा दाखिल पूरक हलफनामे का मतलब है कि सरकार को मौजूदा संकट के हालात की जानकारी है और वह एनसीएलएटी की ओर से कार्रवाई चाहती है। तिवारी ने अपने हलफनामे के जरिए तर्क दिया है कि इस समूह की कर्ज चुकाने की क्षमता और सुशासन और प्रबंधन सुनिश्चित कराने में पर्याप्त सार्वजनिक हित है।
(नोटः यह खबर न्यूज एजेंसी फीड से प्रकाशित की गर्इ। पत्रिका बिजनेस ने इसमें हेडलाइन के अतिरिक्त कोर्इ अन्य बदलाव नहीं किया है।)
Source: business patrika
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